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1 मिनट में बर्बाद जनता के 2.5 लाख रुपए, संसद में हंगामे का बिल कौन भरेगा?

1 मिनट में बर्बाद जनता के 2.5 लाख रुपए, संसद में हंगामे का बिल कौन भरेगा?
राष्ट्रीय
21 Jul 2026, 04:36 pm
रिपोर्टर : Jyoti Sharma

Parliament Expenses: देश के लोकतंत्र का मंदिर है संसद, जहां पर जनता की, उनके अधिकारों, मुद्दों की आवाज़ गूंजनी चाहिए। लेकिन वहां पिछले दो दिनों से सिर्फ शोर सुनाई दे रहा है। विपक्ष का हंगामा कान के पर्दों को फाड़ रहा है। सवाल ये है कि इस शोर का बिल कौन भर रहा है? तो जवाब है—देश की जनता। क्योंकि संसद में हर मिनट हंगामा होता है तो सिर्फ बहस नहीं रुकती, बल्कि करीब ढाई लाख रुपये भी पानी की तरह बहते रहते हैं।

संसद शुरू हुए दो दिन, दोनों हंगामे की भेंट चढ़े

20 जुलाई से संसद का मानसून सत्र शुरू हुआ। लेकिन पहले ही दिन लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही विपक्ष के हंगामे की वजह से बार-बार स्थगित करनी पड़ी और आखिरकार पूरे दिन के लिए रोकनी पड़ी। आज भी वही तस्वीर दोहराई गई। सुबह 11 बजे सदन शुरू हुआ और विपक्ष के हंगामे के चलते पहले स्थगन और फिर पूरे दिन के लिए कार्यवाही ठप हो गई।

यानी लगातार दो दिनों से संसद में जनता के मुद्दों पर काम कम और हंगामा ज्यादा देखने को मिला। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत पूरा विपक्ष राम मंदिर चोरी के मामले, नीट पेपर लीक और 'कॉक्रोच जनता पार्टी' के प्रदर्शन जैसे मुद्दों पर चर्चा की मांग करते हुए सदन में विरोध कर रहा है।

संसदीय कार्यवाही में एक मिनट में खर्च हो रहे ढाई लाख रुपए

संसद की कार्यवाही चलाने का अनुमानित खर्च करीब 2.5 लाख रुपये प्रति मिनट आता है। यानी हर घंटे लगभग 1.5 करोड़ रुपये और करीब 6 घंटे की कार्यवाही के हिसाब से एक दिन का खर्च लगभग 9 करोड़ रुपये बैठता है। अगर कार्यवाही 6 घंटे से ज्यादा चल रही है तो आप ढाई लाख रुपए प्रति मिनट के हिसाब से इसका खर्च जोड़ लीजिए।

सबसे अहम बात ये कि सदन स्थगित होने पर भी ये खर्च रुकता नहीं है। संसद की सुरक्षा, वहां के कर्मचारी, तकनीकी व्यवस्था और पूरा संसदीय तंत्र उसी तरह चलता रहता है। इसलिए जब कार्यवाही बार-बार बाधित होती है, तब करोड़ों रुपये का बोझ सीधे जनता की जेब पर पड़ता है।

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किन मदों में खर्च होता है ये पैसा

1- संसद के चलने में करोड़ों के इस खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा यानी करीब 35 से 40 प्रतिशत खर्च इन्हीं सांसदों के वेतन, भत्तों और सुविधाओं पर होता है जो संसद में खड़े होकर चीख रहे हैं, हंगामा बरपा रहे हैं, बिलों को पेश तक नहीं होने दे रहे। इन सांसदों को एक लाख रुपये मासिक वेतन, 70 हजार रुपये निर्वाचन क्षेत्र भत्ता, 60 हजार रुपये कार्यालय और सहायक खर्च दिया जाता है। इसके अलावा दिल्ली आने पर प्रतिदिन 2 हजार रुपये का विशेष भत्ता और यात्रा सुविधाएं भी मिलती हैं।

2- करीब 25 से 30 प्रतिशत खर्च संसद सचिवालय के हजारों कर्मचारियों पर होता है। इसमें प्रशासनिक अधिकारी, रिपोर्टर, ट्रांसलेटर्स, रिसर्च स्टाफ, स्टेनोग्राफर, मार्शल, डेटा एंट्री ऑपरेटर और सफाई कर्मचारियों का वेतन शामिल है।

3- करीब 20 प्रतिशत खर्च संसद की हाई-टेक व्यवस्थाओं पर होता है। बिजली-पानी, संसद टीवी की लाइव ब्रॉडकास्टिंग, हाई-एंड रिकॉर्डिंग सिस्टम, डिजिटल वोटिंग पैनल, साथ में इनका खाना-पीना... रोज छपने वाले सैकड़ों विधायी दस्तावेजों की लागत इसी में आती है।

4- 10 से 15 प्रतिशत खर्च संसद की सुरक्षा व्यवस्था पर होता है। दिल्ली पुलिस, सीआरपीएफ, संसद सुरक्षा सेवा, 24 घंटे चलने वाला सीसीटीवी नेटवर्क, आधुनिक स्कैनर और बायोमेट्रिक सिस्टम, ये सब तब भी चलते रहते हैं जब सदन में काम ठप हो जाता है।

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